देवर ने भाभी की चूत और गांड दोनों फाड़कर रांड बना दी

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रात के लगभग साढ़े ग्यारह बज रहे थे। घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। पंकज अपने कमरे में लेटा हुआ था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। गर्मी बहुत थी। पंखा जोर-जोर से घूम रहा था, फिर भी पसीना आ रहा था। वो बिस्तर पर करवटें बदल रहा था।

अचानक किचन की तरफ से हल्की आवाज़ आई। जैसे कोई बर्तन हिला रहा हो। पंकज ने घड़ी देखी। इतनी रात को कौन?

वो उठकर बाहर निकला। हॉल में से किचन का लाइट जलता दिख रहा था। वो धीरे-धीरे किचन की तरफ बढ़ा।

दरवाजे के पास पहुँचकर उसने देखा—भाभी।

साड़ी पहने, बाल खुले हुए, गर्दन पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। वो फ्रिज से ठंडा पानी निकाल रही थीं। उनकी पीठ की तरफ से साड़ी थोड़ी सी खिसकी हुई थी, कमर का गड्ढा साफ दिख रहा था।

पंकज खड़ा रहा। साँस भारी हो गई।

भाभी ने पीछे मुड़कर देखा।

“अरे… पंकज? अभी तक सोए नहीं?” उनकी आवाज़ में हल्की थकान थी, लेकिन मुस्कान भी।

“नहीं भाभी… नींद नहीं आ रही। गर्मी बहुत है।” पंकज ने जवाब दिया, आँखें उन पर टिकी रहीं।

भाभी ने पानी का गिलास भरा और पंकज की तरफ बढ़ाया। “लो, ठंडा पानी पी लो। थोड़ा आराम मिलेगा।”

पंकज ने गिलास लिया। उनकी उंगलियाँ भाभी की उंगलियों से छू गईं। एक पल के लिए दोनों रुक गए। भाभी ने जल्दी से हाथ खींच लिया, लेकिन उनकी साँस थोड़ी तेज़ हो गई थी।

“आप क्यों उठे भाभी? इतनी रात को…”

“प्यास लगी थी। और… तुम्हारे भैया आज ऑफिस से लेट आए थे। अभी सो गए हैं।” भाभी ने फ्रिज का दरवाजा बंद किया। उनकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया था। गले का हार और हल्का सा उभरा हुआ सीना साफ दिख रहा था।

पंकज ने पानी पीते हुए नजरें नहीं हटाईं।

भाभी ने महसूस किया। वो थोड़ा मुस्कुराईं, लेकिन आँखें झुका लीं। “अच्छा… जाओ सो जाओ। कल सुबह जल्दी उठना है ना?”

पंकज ने गिलास साइड में रखा। “भाभी… आप भी सो जाइए। इतनी रात तक काम मत कीजिए।”

“काम तो घर का है न बेटा।” भाभी ने हल्के से कहा। फिर वो पंकज के पास से निकलने लगीं।

रास्ते में उनकी साड़ी का किनारा पंकज के हाथ से छू गया। पंकज की साँस रुक गई। भाभी एक पल के लिए रुकीं। दोनों की नज़रें मिलीं।

“पंकज…” भाभी की आवाज़ बहुत धीमी हो गई थी। “कुछ… कुछ गलत मत सोचो।”

“मैं… मैं कुछ नहीं सोच रहा भाभी।” पंकज की आवाज़ भी भारी थी। “बस… आप बहुत… खूबसूरत लग रही हैं आज।”

भाभी की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। फिर उन्होंने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “अब सो जाओ। रात हो गई है।”

वो चली गईं। लेकिन किचन में पंकज अभी भी खड़ा था। उसके मन में सिर्फ भाभी की वो नज़रें घूम रही थीं—जो कुछ सेकंड के लिए उसके शरीर पर रुकी थीं।


अगली सुबह।

पंकज उठकर बाथरूम गया। जब वो बाहर निकला तो देखा भाभी रसोई में चाय बना रही थीं। आज उन्होंने सूती का सलवार-कमीज पहना था। कमीज थोड़ी टाइट थी। कमर साफ दिख रही थी।

“गुड मॉर्निंग भाभी।”

“गुड मॉर्निंग। आओ, चाय ले लो।” भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा।

पंकज पास आकर खड़ा हो गया। भाभी चाय में चीनी डाल रही थीं। उनकी बाँहें नंगी थीं। पसीने से चमक रही थीं।

“भाभी… कल रात…” पंकज ने धीरे से शुरू किया।

भाभी ने चाय की केतली नीचे रखी। उन्होंने पंकज की तरफ देखा। “क्या?”

“आप… आपने मुझे देखा था ना? उस तरह से…”

भाभी चुप रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “पंकज… तुम अभी छोटे हो। ऐसी बातें मत करो।”

“मैं छोटा नहीं हूँ भाभी।” पंकज ने कदम बढ़ाया। अब वो भाभी के बहुत करीब था। “और आप भी जानती हैं।”

भाभी की साँस तेज़ हो गई। उन्होंने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन दीवार आ गई। पंकज ने दोनों हाथ दीवार पर टिका दिए। भाभी घिरी हुई थीं।

“पंकज… छोड़ो… भैया…”

“भैया सो रहे हैं। और मैं… मैं सिर्फ बात कर रहा हूँ।” पंकज की आवाज़ बहुत धीमी और भारी थी। “कल रात आपने मुझे देखा था। आपकी आँखों में… कुछ और था।”

भाभी ने आँखें बंद कर लीं। “मत बोलो… प्लीज…”

पंकज ने एक हाथ धीरे से उनकी ठोड़ी पर रखा। “देखो मुझे।”

भाभी ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में डर था, लेकिन उसके नीचे कुछ और भी था—इच्छा।

“तुम्हें समझ नहीं आता…” भाभी ने फुसफुसाते हुए कहा। “ये गलत है।”

“गलत लगता है… या फिर अच्छा?” पंकज ने पूछा।

भाभी जवाब नहीं दे पाईं। उनकी साँसें तेज़ चल रही थीं। पंकज का हाथ उनकी ठोड़ी से गर्दन की तरफ सरक गया। हल्के से छूते हुए।

“पंकज… मत…” लेकिन उनकी आवाज़ में मना करने वाला जोर नहीं था।

पंकज ने और करीब आ गया। अब दोनों के शरीर लगभग छू रहे थे। भाभी की साँस उसकी छाती पर पड़ रही थी।

अचानक बाहर से भैया की आवाज़ आई—“अरे चाय कहाँ है?”

दोनों झट से अलग हो गए। भाभी ने जल्दी से चाय का कप उठाया और बाहर चली गईं। पंकज किचन में खड़ा रह गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।


शाम को।

भैया ऑफिस चले गए थे। घर में सिर्फ पंकज और भाभी थे। पंकज टीवी देख रहा था, लेकिन ध्यान कहीं और था। भाभी कमरे में कपड़े बदल रही थीं। दरवाजा आधा खुला था।

पंकज उठकर धीरे-धीरे उनके कमरे की तरफ बढ़ा। दरवाजे से अंदर देखा।

भाभी साड़ी उतार चुकी थीं। सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में थीं। ब्लाउज के हुक खोल रही थीं। उनकी पीठ नंगी हो रही थी। कमर की लकीर साफ दिख रही थी।

पंकज की साँस रुक गई। वो चुपचाप खड़ा रहा।

भाभी ने पीछे मुड़कर देखा। झटके से ब्लाउज पकड़ लिया। “पंकज?! तुम… तुम क्या कर रहे हो?!”

“मैं… मैं सिर्फ…” पंकज अंदर घुस आया और दरवाजा बंद कर दिया।

“बाहर जाओ!” भाभी की आवाज़ में घबराहट थी। वो पीछे हट रही थीं।

पंकज पास आया। “भाभी… मैं अब और नहीं रोक सकता।”

“पंकज… ये पागलपन है। भैया…”

“भैया नहीं हैं।” पंकज ने उनका हाथ पकड़ लिया। “और आप भी नहीं रोकना चाहतीं। कल रात… आज सुबह… सब झूठ था क्या?”

भाभी की आँखों में पानी आ गया। “तुम समझते नहीं… मैं तुम्हारी भाभी हूँ…”

“हाँ। हो।” पंकज ने उन्हें दीवार से सटा दिया। “लेकिन आज रात… सिर्फ औरत हो।”

उसने धीरे से भाभी के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहले हल्का सा। फिर गहरा। भाभी ने विरोध किया, लेकिन कुछ सेकंड बाद उनके होंठ भी जवाब देने लगे। हाथ पंकज की छाती पर थे—धकेलने के लिए नहीं, बल्कि पकड़ने के लिए।

चुंबन लंबा चला। जब दोनों अलग हुए तो साँसें उखड़ी हुई थीं।

“पंकज…” भाभी फुसफुसाईं। “अब रुक जा… वरना…”

“अब नहीं रुकूँगा।” पंकज ने उनका ब्लाउज पूरा खोल दिया। स्तन बाहर आ गए। गोल, भारी, निप्पल पहले से ही सख्त।

पंकज ने एक स्तन को हाथ में लिया और धीरे से दबाया। फिर मुँह में ले लिया। जीभ से घुमाया। भाभी की कमर ऐंठ गई। उनकी उंगलियाँ पंकज के बालों में घुस गईं।

“आह… पंकज… धीरे…”

पंकज ने दूसरा स्तन भी चूसा। दोनों हाथों से पेटीकोट नीचे खींच दिया। अब भाभी सिर्फ पैंटी में थीं। पंकज ने पैंटी के ऊपर से हाथ फेरा। गीली थी।

“देखो… कितनी गीली हो गई हो।” पंकज ने फुसफुसाया।

भाभी शर्म से आँखें बंद किए हुए थीं। “मत बोलो… शर्म आ रही है…”

पंकज ने पैंटी भी उतार दी। अब भाभी पूरी नंगी थीं। पंकज ने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया। खुद भी कपड़े उतारने लगा।

भाभी ने आँखें खोलीं। पंकज का लंड देखकर उनकी आँखें फैल गईं। सख्त, लंबा, नसों से भरा हुआ।

“इतना… बड़ा…”

पंकज उनके ऊपर लेट गया। दोनों के शरीर चिपक गए। उसने धीरे से भाभी की टाँगें फैलाईं और अपने लंड को उनकी चूत पर रगड़ने लगा। गीलेपन से सरक रहा था।

“भाभी… अंदर डालूँ?”

भाभी ने आँखें बंद कर लीं। “धीरे… प्लीज धीरे…”

पंकज ने सिर अंदर धकेला। भाभी की चूत टाइट थी। धीरे-धीरे पूरा अंदर चला गया। दोनों एक साथ कराह उठे।

“आह्ह… पंकज… पूरा… पूरा अंदर है…”

पंकज ने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। पहले छोटे-छोटे धक्के। फिर तेज़। भाभी की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। उनके नाखून पंकज की पीठ पर लग रहे थे।

“हाँ… ऐसे… और तेज़…” भाभी अब खुद बोल रही थीं।

पंकज ने उनकी टाँगें कंधों पर रख लीं। और गहराई तक घुसने लगा। हर धक्के के साथ भाभी की कराह निकल रही थी। बिस्तर चरमरा रहा था।

“भाभी… तुम्हारी चूत कितनी गरम और टाइट है…”

“चुप… मत बोलो गंदी बातें…” लेकिन उनकी आवाज़ में मजा साफ था।

पंकज ने और तेज़ कर दिया। भाभी का शरीर काँप रहा था। उनकी चूत भींच रही थी।

“पंकज… मैं… मैं आने वाली हूँ…”

“आ जाओ भाभी… मेरे ऊपर आ जाओ…”

भाभी का शरीर अकड़ गया। वो जोर से कराह उठीं। उनकी चूत जोर-जोर से धड़कने लगी। पंकज ने भी अपने आप को नहीं रोका। वो अंदर ही झड़ गया। गर्म लोड भरता चला गया।

दोनों पसीने से लथपथ लेटे रहे। साँसें उखड़ी हुईं।

कुछ देर बाद भाभी ने धीरे से कहा, “पंकज… ये… ये सिर्फ आज की बात थी। कल से… फिर कभी नहीं।”

पंकज ने उनकी तरफ देखा। मुस्कुराते हुए बोला, “कल देखेंगे भाभी।”

भाभी चुप रहीं। लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी—शर्म और संतुष्टि मिली-जुली।

रात अभी बाकी थी।

रात और गहरी हो गई थी। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज़ और दोनों की भारी साँसें चल रही थीं। पंकज अभी भी भाभी के ऊपर लेटा था। उसका लंड अभी भी उनकी गीली चूत के अंदर था, धीरे-धीरे सिकुड़ रहा था लेकिन पूरी तरह बाहर नहीं निकला था।

भाभी की आँखें बंद थीं। पसीने से उनका शरीर चमक रहा था। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। पंकज ने धीरे से उनका एक निप्पल मुँह में ले लिया और जीभ घुमाई।

“आह्ह… पंकज… अभी भी…” भाभी की आवाज़ फटी हुई थी।

“अभी तो शुरू ही हुआ है भाभी।” पंकज ने लंड को अंदर ही अंदर घुमाया। भाभी की चूत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी—भींच ली।

“साला… तू निकालेगा भी या नहीं?” भाभी ने आँखें खोलकर देखा। उनकी आवाज़ में झुंझलाहट थी, लेकिन आँखों में भूख साफ थी।

पंकज हँसा। “निकालूँ? अभी तो मैंने अंदर झड़ा है। तेरी चूत में मेरा माल भरा पड़ा है। देख…” उसने धीरे से लंड बाहर खींचा। चूत से सफेद गाढ़ा वीर्य रिसने लगा, जांघों पर बहने लगा।

भाभी ने शर्म से टाँगें समेट लीं। “अभद्र… मत देख।”

“क्यों नहीं देखूँ? मेरी भाभी की चूत में मेरा ही माल है।” पंकज ने दो उंगलियाँ उनकी चूत में घुसा दीं। अंदर का वीर्य और गीलापन निकालकर भाभी के मुँह के पास ले गया। “चख।”

भाभी ने सिर घुमा लिया। “नहीं… गंदा है।”

पंकज ने जबरदस्ती उनकी ठोड़ी पकड़ी और उंगलियाँ होंठों पर रगड़ीं। “चख ले। अपनी चूत का स्वाद और मेरे लंड का मिलन।”

भाभी ने हिचकिचाते हुए जीभ निकाली। उंगलियाँ चाटीं। चेहरे पर ग्लानि और मजा दोनों साफ थे। “स्वाद… नमकीन… और गरम…”

“अब और चख।” पंकज उठकर उनके चेहरे के पास बैठ गया। उसका लंड फिर से सख्त होने लगा था—वीर्य से चमकता हुआ, नसें फूली हुईं। उसने लंड भाभी के होंठों पर थपथपाया। “मुँह खोल।”

भाभी ने आँखें बंद कर लीं और मुँह खोला। पंकज ने धीरे-धीरे लंड अंदर धकेल दिया। गला तक। भाभी ने गैग किया, आँखों से पानी निकल आया, लेकिन पंकज ने बाल पकड़कर और अंदर ठेल दिया।

“हाँ… ऐसी ही… गला खोल मेरी रांड। अपने देवर का लंड पूरा निगल।”

भाभी की आँखें लाल हो गईं। लार बह रही थी। पंकज ने दोनों हाथ उनके सिर पर रखे और जोर-जोर से मुँह चोदने लगा। थप-थप की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। भाभी की छाती पर लार के छींटे पड़ रहे थे।

“कितनी अच्छी चुदक्कड़ है मेरी भाभी… भैया को पता चल जाए तो क्या होगा?” पंकज ने जोर से धक्का मारा। लंड गले में अटक गया। भाभी ने उसके जांघों को पकड़ लिया, नाखून चुभा दिए।

पंकज ने निकाल लिया। भाभी जोर से खाँसी। लार और वीर्य का मिश्रण ठोड़ी से टपक रहा था।

“अब खड़ी हो।” पंकज ने उन्हें उठाया और दीवार से सटा दिया। पीछे से उनके कूल्हों को पकड़कर लंड उनकी गीली चूत पर रगड़ा। “अब पीछे से चोदूँगा। झुक।”

भाभी ने दीवार पकड़ ली। कमर मोड़ दी। पंकज ने एक झटके में पूरा लंड अंदर ठेल दिया।

“आह्ह्ह… माधर्चोद… इतना गहरा…” भाभी चीख पड़ीं।

“चुप रह रांड। वरना पूरे मोहल्ले को पता चल जाएगा कि देवर भाभी की चूत फाड़ रहा है।” पंकज ने दोनों हाथ उनके स्तनों पर लगा दिए और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ भाभी की गांड हिल रही थी। चूत से पानी की आवाज़ आ रही थी—छप-छप।

“तेरी चूत कितनी रसीली है भाभी… भैया कभी ऐसे चोदता है क्या?”

“नहीं… वो… वो जल्दी झड़ जाता है…” भाभी ने हांफते हुए कहा। “तू… तू जानवर की तरह चोद रहा है…”

“जानवर ही हूँ तेरे लिए।” पंकज ने एक हाथ उनकी चूत पर ले जाकर चूत की फांक पर उंगली घुमाई। साथ ही लंड और तेज़ी से अंदर-बाहर करने लगा।

भाभी का शरीर काँप रहा था। “पंकज… धीरे… नहीं तो… मैं फिर से…”

“आ जा। अपनी चूत मेरे लंड पर झाड़।” पंकज ने और तेज़ कर दिया। दीवार से भाभी का माथा टकरा रहा था। स्तन दीवार पर रगड़ खा रहे थे।

भाभी अचानक जोर से काँपीं। “आआाह्ह… आ गई… आ गई साले…” उनकी चूत जोर-जोर से भींचने लगी। पानी की धार पंकज के लंड और जांघों पर छूट गई।

पंकज रुका नहीं। वो और तेजी से चोदता रहा। “अब मैं भी झाड़ूँगा… तेरी चूत में…”

“नहीं… बाहर निकाल… गर्भ…” भाभी ने विरोध किया लेकिन शरीर नहीं हिला।

पंकज ने आखिरी जोरदार धक्के मारे और अंदर ही अंदर झड़ गया। गर्म गाढ़ा वीर्य दोबारा उनकी चूत में भर गया। इतना कि बाहर निकलने लगा।

दोनों दीवार से सटकर गिर पड़े। फर्श पर। पसीना, वीर्य, लार—सब मिला हुआ।

कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर पंकज ने भाभी के बाल पीछे से पकड़े और उनके कान में फुसफुसाया, “अब उठ। बिस्तर पर जा। मैं अभी थका नहीं हूँ।”

भाभी ने थकी हुई आँखों से देखा। “तू… तू पागल है क्या? अभी-अभी दो बार…”

“तीसरी बार अभी होगी।” पंकज ने उन्हें गोद में उठाया और बिस्तर पर पटक दिया। भाभी की टाँगें फैला दीं। चूत पूरी तरह खुली हुई थी—लाल, सूजी हुई, वीर्य से लथपथ।

पंकज ने अपना लंड फिर से सख्त किया। मुँह से थूक निकाला और चूत पर लगा दिया। फिर एक झटके में अंदर घुसा दिया।

“आह्ह… बहनचोद… अब तो दर्द हो रहा है…”

“दर्द में भी मजा ले रांड।” पंकज ने उनकी टाँगें कंधों तक मोड़ दीं। इतनी गहराई तक कि अंडकोष उनकी गांड से टकरा रहे थे। हर धक्के के साथ भाभी की चीख निकल रही थी।

“तेरी गांड भी चोदूँगा आज। तैयार रह।”

भाभी की आँखें फैल गईं। “नहीं… वहाँ मत… कभी नहीं किया…”

“आज करेगा तेरा देवर।” पंकज ने लंड निकाला। चूत से निकले वीर्य को उंगलियों से उनकी गांड के छेद पर लगा दिया। एक उंगली धीरे से अंदर घुसाई।

भाभी तड़प उठीं। “आह्ह… दर्द… निकाल…”

“सह ले। अभी तो उंगली है। लंड तो बाद में जाएगा।” पंकज ने दूसरी उंगली भी डाल दी। गांड खोलने लगा। साथ ही अपना लंड उनकी चूत में वापस ठेल दिया। दोनों छेद एक साथ भरे हुए थे।

भाभी पागल हो रही थीं। “पंकज… बस… अब और नहीं…”

“बस नहीं। आज रात पूरी तेरी गांड और चूत दोनों फाड़नी है।” पंकज ने उंगलियाँ निकालकर लंड उनकी गांड पर लगाया। धीरे-धीरे दबाव दिया।

सिर अंदर गया। भाभी जोर से चिल्लाईं। “माँ की… निकाल साले… बहुत दर्द…”

पंकज रुका नहीं। धीरे-धीरे पूरा अंदर धकेल दिया। गांड टाइट थी। इतनी कि लंड दब रहा था। उसने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया।

“देख… तेरी गांड भी ले रही है मेरे लंड को। चुदक्कड़ भाभी।”

भाभी रो रही थीं, लेकिन शरीर पीछे की तरफ धक्के दे रहा था। “जोर से… अगर चोदना ही है तो जोर से चोद…”

पंकज ने लगाम खोल दी। जोर-जोर से गांड चोदने लगा। एक हाथ से उनकी चूत में उंगलियाँ घुमा रहा था। दूसरे हाथ से स्तन मरोड़ रहा था।

कमरे में सिर्फ मांस की थप-थप और भाभी की दबी हुई चीखें गूँज रही थीं।

“पंकज… मैं… फिर से आ रही हूँ…”

“आ जा। गांड में मेरे लंड पर झाड़।”

भाभी का शरीर ऐंठ गया। इस बार इतनी जोर से आईं कि उनकी चूत से पानी की धार छूटी और गांड भी भींच गई। पंकज सह नहीं पाया। वो भी गांड के अंदर ही झड़ गया। गर्म माल उनकी गांड में भरता चला गया।

दोनों बिस्तर पर ढेर हो गए। साँसें फूल रही थीं। शरीर चिपक रहे थे।

पंकज ने धीरे से लंड बाहर निकाला। गांड का छेद खुला हुआ था, वीर्य रिस रहा था। चूत भी वैसी ही।

भाभी ने आँखें बंद करके कहा, “तू… तूने मुझे बर्बाद कर दिया…”

पंकज उनके पास लेट गया। एक हाथ उनके स्तन पर रखकर बोला, “बर्बाद नहीं किया। आज से तू सिर्फ मेरी रांड है। भैया के सामने भी यही सोचना। समझी?”

भाभी ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी छाती पर सिर रख दिया। उंगलियों से उसके लंड को सहलाते हुए फुसफुसाईं, “कल… जब भैया ऑफिस जाएँ… फिर से चोदना। लेकिन इस बार… और गंदी बातें बोलना।”

पंकज मुस्कुराया। उसका लंड फिर से उठने लगा था।

📁 Bhabhi

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